मैं जिस राह पर भटक रही हूँ
तुम कैसे उसी पर गम हुए?
शायद पहले से बैठे ठे यहाँ
रहगुज़र की तलाश में...
जब तुम्हारा साथ मिला
तस्सली हुई एक घडी
जब मन कुछ खुसफुसाये
रूह ने साँस ली
फिर नज़र आया रास्ता
सामने था जो इंतज़ार में
मुश्किल थी की दो थी सड़कें
और दो थे हम
....कितना आसान था अपना अपना
रास्ता पकड़ लेना
चुन लिया है मैंने वो एक
कुछ टेडा मेडा है
कुछ डर है सफ़र का
पर अब भटकने की आदत पड़ गयी है
इस राह पर तुम्हे भटकने को कैसे कहूँ
तुम भी जानते हो,ये सफ़र है तनहा
तभी है इसमें मज़ा
नहीं दे सकते हम एक दूजे को सहारा
मुझे क्या मालुम मेरी मस्जिद है कहाँ
तुम्हारा हाथ पकड़ कर
कभी नज़र आती है,
कभी नहीं....
