आज घर की एक क्यारी में
एक छोटे से गमले में
एक सफ़ेद फूल खिला
मुझे देख कर बोला-
'लो में आ गया,तुम्हारे लिए'
'तुम्हारे मन की ही तो चाहत हूँ मैं'
बहती हवा ने दस्तक दी और कहा-
'क्या मेरे साथ उड़ोगे?
आओ मेरा हाथ पकड़ो...
ले चलूँ तुम्हे इस किनारे से दूर...'
'तुम्हारे मन का ही तो ख्वाब हूँ मैं'
सुनहरी धूप चांदनी बन गयी
सारी आवाजें जाने कहाँ घुल गयी
खिड़की से बारिश ने आवाज़ दी-
'आओ छत पर-
मेरे साथ झूमो और नाचो'
'तुम्हारे मन का ही तो गीत हूँ मैं'
कुछ ओस के बूंदों से आइना बना था
झांकर मैंने पूछा-
'ऐसा क्या है मेरे मन में
जो दिखता नहीं मुझे?'
मन बोला-'तुम हो तो मैं हूँ-
तुम्हारे एहसासों के सहारे जिंदा हूँ-
तुम्हारा मन भी हूँ और मीत भी हूँ मैं'
