गोल घुमती सीडियों को चढ़
तुम्हारे दर तक आ पहुंची
जल्दी में अन्दर घुस पड़ी
और गिर पड़ी लड्खाराकर
इतने भीड़ क्यों है यहाँ
कितना कुछ बिखेर रखा है तुमने
समेटू क्या? पर नहीं!
कुछ गिर कर टूट न जाये
फिर तुमने पास बिठाकर
एक किताब दे दी पढने को
कभी खुद ही कुछ पढ़ दिया
और पन्ने पलटते गए
तभी याद आया मुझे तो जाना था
काम से वापस
फिर और भी लोग हैं यहाँ
किताबें पढ़ते हुए
क्या उन्हें अपने घर नहीं जाना था?
बाहर निकले तो बारिश शुरू हो गयी
वापस मुड़ी तो दरवाज़ा था बंद
दस्तक देना ठीक नहीं लगा
तो वहीँ बैठ गयी
तुम्हारी चौखट पर
कुछ जादू है इस जगह में
जैसे बाँध लिया है मुझे अपने से
आते जाते क्या कहने क्या सुनना
बैठे हूँ यहाँ कुछ पल के लिए
एक अजीब सा सुकून हैं
यहाँ बैठे रहने में
न अन्दर की भीड़ की घुटन है
न बाहर के सूनापन!

शब्दों को बाँध कर तुमने कविता की ऊँची उड़ान भरी है ... बहुत सुन्दर लिखा है ... उस सुकून को मैंने भी अनुभव किया है ... ऐसा लगता है जैसे तुमने मेरी अनुभूति को शब्द दिए है .. शुक्रिया
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