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Educationist,Psychologist,Author,Trainer and Writer

Friday, November 26, 2010

Mummy ke bistar par

वैसे तो रातों को नींद आ जाती है
कुछ थकान और कुछ ख्याबों के सहारे
पर होता है जब वो आँचल करीब
बिखरते हैं उसमे से रात के तारे

बचपन उछल वापस आ जाता है
उस सच्चे स्पर्श की चाहत में
आँखें भी जब बंद हो जाती हैं
महसूस होती है राहत मन में

उन हाथों का सहलाना
उन आँखों की समझ
वो मन जो समझा मेरा हर आंसू
वो अनकही बातें जिसमे
प्यार गया उलझ्ह

एक डर लगा एक रात
जब बिस्तर दिखा खाली साथ में
भरी नींद टूट गयी सोच
क्या खो जायेगी ये छवि एक दिन?
दर्द भर आया आँखों में पानी बन

जानती हूँ मेरे ह्रदय में उतर आई है
वो ममता जो मिली है तुमसे
जब मेरे साथ सोएगी एक नन्ही से जान
तब तुम और मैं एक हो जायेंगे

क्या कभी मेरी बेटी भी सोचेगी?
मम्मी के बिस्तर पर......

Tuesday, November 23, 2010

Ek aur Aakash

धरती पर जब जनम हुआ
था आधा आकाश
जब आँख खुली और पाँव चले
फैला था बादल तराश

कभी धुप में सुनेहरा हुआ
कभी बरसाए गीत
कितने ढलती शामें बीटी
कितने रंग बन गए मीत

एक दिन ढहक गयी उससे एक चादर
रहती गयी में घूर
काट कर उससे छूना चाह
पर हाथ न पहुंचे उतनी दूर

है तो वो वहीँ,मन कहता है
आँखें मेरी ढूंढ रही हैं
दीखता है तुम्हारी आँखों में
उसका कुछ हिस्सा
जहाँ मेरी नींदें सोयी हुई हैं

Monday, November 15, 2010

Anukampa

कुछ कहने की ज़रुरत नहीं
कुछ कोशिश भी मत करना
जब यूंही बैठे बैठे बातें करेंगे हम
तो आ मिलेगी अनुकम्पा

जब छिड़ेंगे दिलों के तार
 गुनगुनायेगी वो
जन जुड़ेंगे मन के तार
मुस्कुरायेगे वो
एक आँगन बना कर यहाँ
बस जायेगी वो

कहना कुछ मत उससे
सहम वो जाती है
रहने देना हम दोनों के बीच
इस दूरी को बस
वो ही तै कर पाती hai