धरती पर जब जनम हुआ
था आधा आकाश
जब आँख खुली और पाँव चले
फैला था बादल तराश
कभी धुप में सुनेहरा हुआ
कभी बरसाए गीत
कितने ढलती शामें बीटी
कितने रंग बन गए मीत
एक दिन ढहक गयी उससे एक चादर
रहती गयी में घूर
काट कर उससे छूना चाह
पर हाथ न पहुंचे उतनी दूर
है तो वो वहीँ,मन कहता है
आँखें मेरी ढूंढ रही हैं
दीखता है तुम्हारी आँखों में
उसका कुछ हिस्सा
जहाँ मेरी नींदें सोयी हुई हैं

दीखता है तुम्हारी आँखों में
ReplyDeleteउसका कुछ हिस्सा
जहाँ मेरी नींदें सोयी हुई हैं
कितना सुन्दर और गहरा भावार्थ छुपा है इन पंक्तियों में .... बहुत खूब
Too good mam! Deep feelings crafted beautifully:)
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