वैसे तो रातों को नींद आ जाती है
कुछ थकान और कुछ ख्याबों के सहारे
पर होता है जब वो आँचल करीब
बिखरते हैं उसमे से रात के तारे
बचपन उछल वापस आ जाता है
उस सच्चे स्पर्श की चाहत में
आँखें भी जब बंद हो जाती हैं
महसूस होती है राहत मन में
उन हाथों का सहलाना
उन आँखों की समझ
वो मन जो समझा मेरा हर आंसू
वो अनकही बातें जिसमे
प्यार गया उलझ्ह
एक डर लगा एक रात
जब बिस्तर दिखा खाली साथ में
भरी नींद टूट गयी सोच
क्या खो जायेगी ये छवि एक दिन?
दर्द भर आया आँखों में पानी बन
जानती हूँ मेरे ह्रदय में उतर आई है
वो ममता जो मिली है तुमसे
जब मेरे साथ सोएगी एक नन्ही से जान
तब तुम और मैं एक हो जायेंगे
क्या कभी मेरी बेटी भी सोचेगी?
मम्मी के बिस्तर पर......

हाँ जरूर तुम्हारी बेटी भी सोचेगी ...... वो भी जानेगी की तुमने कैसे बिखेरे है रात के तारे अपने आँचल से .... बहुत खूब नीति .. तुमने मात्र्तव के भावो का बहुत सुन्दर चित्रण किया है
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