About Me

My photo
Educationist,Psychologist,Author,Trainer and Writer

Saturday, July 23, 2011

आज घर की एक क्यारी में
एक छोटे से गमले में
एक सफ़ेद फूल खिला
मुझे देख कर बोला-
'लो में आ गया,तुम्हारे लिए'
'तुम्हारे मन की  ही तो चाहत हूँ मैं'

बहती हवा ने दस्तक दी और कहा-
'क्या मेरे साथ उड़ोगे?
आओ मेरा हाथ पकड़ो...
ले चलूँ तुम्हे इस किनारे से दूर...'
'तुम्हारे मन का ही  तो ख्वाब हूँ मैं'

सुनहरी धूप चांदनी बन गयी
सारी आवाजें जाने कहाँ घुल गयी
खिड़की से बारिश ने आवाज़ दी-
'आओ छत पर-
मेरे साथ झूमो और नाचो'
'तुम्हारे मन का ही  तो गीत हूँ मैं'

कुछ ओस के बूंदों से आइना बना था
झांकर मैंने पूछा-
'ऐसा क्या है मेरे मन में 
जो दिखता नहीं मुझे?'
मन बोला-'तुम हो तो मैं हूँ-
तुम्हारे एहसासों के सहारे जिंदा हूँ-
तुम्हारा मन भी हूँ और मीत भी हूँ मैं'



Wednesday, March 2, 2011

Tumhaari chaukhat par

गोल घुमती सीडियों को चढ़
तुम्हारे दर तक आ पहुंची
जल्दी में अन्दर घुस पड़ी
और गिर पड़ी लड्खाराकर 

इतने भीड़ क्यों है यहाँ
कितना कुछ  बिखेर  रखा है तुमने
समेटू क्या? पर नहीं!
कुछ गिर कर टूट न जाये

फिर तुमने पास बिठाकर
एक किताब दे दी पढने को
कभी खुद ही कुछ पढ़  दिया
और पन्ने पलटते गए

तभी याद आया मुझे तो जाना था
 काम  से वापस
फिर और भी लोग हैं यहाँ
किताबें पढ़ते हुए
क्या उन्हें अपने घर नहीं जाना था?

बाहर निकले तो बारिश शुरू हो गयी
वापस मुड़ी तो दरवाज़ा था बंद
दस्तक देना ठीक नहीं लगा
तो वहीँ बैठ गयी
तुम्हारी चौखट पर

कुछ जादू है इस जगह में
जैसे बाँध लिया है मुझे अपने से
आते जाते क्या कहने क्या सुनना
बैठे हूँ यहाँ कुछ पल के लिए

एक अजीब सा सुकून हैं
यहाँ बैठे रहने में
न अन्दर की भीड़ की घुटन है
न बाहर के सूनापन!





Friday, February 18, 2011

WATERING THE CACTUS

(A lovely gift from Abhishek- I think in 1996)

You can't love a cactus too much
It may die of disbelief!

Futile-Its too stoic to cup its hands
suffer without complaining
A lesson it has learnt

It looks dead
But pluck a thorn and you'll find
Life in tis bosom

Or is it a tear held back
when another callous cloud ignored it?
No one ever heard a cactus cry

For it life is a post dated cheque
With no signature on it

Maybe it is not water a cactus is asking for

Why is its flower hauntingly beautiful?
And so short lived?

What the hell
After all I can do it tomorrow!

Friday, January 21, 2011

ek wo...

एक पल वो था
जब तुम्हारी छवि ने छुआ था
पता नहीं चल मुझे

एक धड़कन वो थी
जब तुमने ख़ामोशी से पुकारा था
कुछ हुआ था मुझे

एक बहार वो थी
जब तुमने प्यार से छुआ था
प्यार हुआ था मुझे

एक अँधेरा वो था
जब तुमने हाथ पकड़ उठाया था
खुदा दिखा था मुझे

एक मोड़ वो था
जब तुमे मांग भर अपनाया था
जीवन नया मिला था मुझे

और
आज एक वो है
जब तुमने निगाहों से थामा था
सहारा मिल ही गया  मुझे 

Wednesday, December 8, 2010

Untitled

मैं जिस राह पर भटक रही हूँ
तुम कैसे उसी पर गम हुए?
शायद पहले से बैठे ठे यहाँ
रहगुज़र की तलाश में...

जब तुम्हारा साथ मिला
तस्सली हुई एक घडी
जब मन कुछ खुसफुसाये
रूह ने साँस ली

फिर नज़र आया रास्ता
सामने था जो इंतज़ार में
मुश्किल थी की दो थी सड़कें
और दो थे हम
....कितना आसान  था अपना अपना
रास्ता पकड़ लेना

चुन लिया है मैंने वो एक
कुछ टेडा मेडा है
कुछ डर है सफ़र का
पर अब भटकने की आदत पड़ गयी है
इस राह पर तुम्हे भटकने को कैसे कहूँ
तुम भी जानते हो,ये सफ़र है तनहा
तभी है इसमें मज़ा
नहीं दे सकते हम एक दूजे को सहारा

मुझे क्या मालुम मेरी मस्जिद है कहाँ
तुम्हारा हाथ पकड़ कर
कभी नज़र आती है,
कभी नहीं....

Friday, November 26, 2010

Mummy ke bistar par

वैसे तो रातों को नींद आ जाती है
कुछ थकान और कुछ ख्याबों के सहारे
पर होता है जब वो आँचल करीब
बिखरते हैं उसमे से रात के तारे

बचपन उछल वापस आ जाता है
उस सच्चे स्पर्श की चाहत में
आँखें भी जब बंद हो जाती हैं
महसूस होती है राहत मन में

उन हाथों का सहलाना
उन आँखों की समझ
वो मन जो समझा मेरा हर आंसू
वो अनकही बातें जिसमे
प्यार गया उलझ्ह

एक डर लगा एक रात
जब बिस्तर दिखा खाली साथ में
भरी नींद टूट गयी सोच
क्या खो जायेगी ये छवि एक दिन?
दर्द भर आया आँखों में पानी बन

जानती हूँ मेरे ह्रदय में उतर आई है
वो ममता जो मिली है तुमसे
जब मेरे साथ सोएगी एक नन्ही से जान
तब तुम और मैं एक हो जायेंगे

क्या कभी मेरी बेटी भी सोचेगी?
मम्मी के बिस्तर पर......

Tuesday, November 23, 2010

Ek aur Aakash

धरती पर जब जनम हुआ
था आधा आकाश
जब आँख खुली और पाँव चले
फैला था बादल तराश

कभी धुप में सुनेहरा हुआ
कभी बरसाए गीत
कितने ढलती शामें बीटी
कितने रंग बन गए मीत

एक दिन ढहक गयी उससे एक चादर
रहती गयी में घूर
काट कर उससे छूना चाह
पर हाथ न पहुंचे उतनी दूर

है तो वो वहीँ,मन कहता है
आँखें मेरी ढूंढ रही हैं
दीखता है तुम्हारी आँखों में
उसका कुछ हिस्सा
जहाँ मेरी नींदें सोयी हुई हैं