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Educationist,Psychologist,Author,Trainer and Writer

Monday, November 15, 2010

Anukampa

कुछ कहने की ज़रुरत नहीं
कुछ कोशिश भी मत करना
जब यूंही बैठे बैठे बातें करेंगे हम
तो आ मिलेगी अनुकम्पा

जब छिड़ेंगे दिलों के तार
 गुनगुनायेगी वो
जन जुड़ेंगे मन के तार
मुस्कुरायेगे वो
एक आँगन बना कर यहाँ
बस जायेगी वो

कहना कुछ मत उससे
सहम वो जाती है
रहने देना हम दोनों के बीच
इस दूरी को बस
वो ही तै कर पाती hai

1 comment:

  1. सीधे सरल शब्दों में दिल के तारों के सारे अरमान झंकृत कर दिए तुमने ...... बहुत खूब ब्लोग्गेर्स कम्युनिटी में तुम्हारा स्वागत है ... शानदार प्रस्तुति नीति

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