कुछ कहने की ज़रुरत नहीं
कुछ कोशिश भी मत करना
जब यूंही बैठे बैठे बातें करेंगे हम
तो आ मिलेगी अनुकम्पा
जब छिड़ेंगे दिलों के तार
गुनगुनायेगी वो
जन जुड़ेंगे मन के तार
मुस्कुरायेगे वो
एक आँगन बना कर यहाँ
बस जायेगी वो
कहना कुछ मत उससे
सहम वो जाती है
रहने देना हम दोनों के बीच
इस दूरी को बस
वो ही तै कर पाती hai

सीधे सरल शब्दों में दिल के तारों के सारे अरमान झंकृत कर दिए तुमने ...... बहुत खूब ब्लोग्गेर्स कम्युनिटी में तुम्हारा स्वागत है ... शानदार प्रस्तुति नीति
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