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Educationist,Psychologist,Author,Trainer and Writer

Tuesday, November 23, 2010

Ek aur Aakash

धरती पर जब जनम हुआ
था आधा आकाश
जब आँख खुली और पाँव चले
फैला था बादल तराश

कभी धुप में सुनेहरा हुआ
कभी बरसाए गीत
कितने ढलती शामें बीटी
कितने रंग बन गए मीत

एक दिन ढहक गयी उससे एक चादर
रहती गयी में घूर
काट कर उससे छूना चाह
पर हाथ न पहुंचे उतनी दूर

है तो वो वहीँ,मन कहता है
आँखें मेरी ढूंढ रही हैं
दीखता है तुम्हारी आँखों में
उसका कुछ हिस्सा
जहाँ मेरी नींदें सोयी हुई हैं

2 comments:

  1. दीखता है तुम्हारी आँखों में
    उसका कुछ हिस्सा
    जहाँ मेरी नींदें सोयी हुई हैं

    कितना सुन्दर और गहरा भावार्थ छुपा है इन पंक्तियों में .... बहुत खूब

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  2. Too good mam! Deep feelings crafted beautifully:)

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